हम सभी पत्रकार साथियों के साथ एक अजीब विडंबना यह है कि कतिपय कुछ अपने ही साथी लोग एक दूसरे से श्रेष्ठ दिखने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों से ही हमेशा यह कहते हैं कि फलां पत्रकार तो फर्जी है।


मेरा उन सभी पत्रकार साथियों से एक ही सवाल है कि फर्जी घोषित करने के मापदंड क्या हैं जिससे कि कोई भी किसी भी पत्रकार साथी को फर्जी एवम तथाकथित घोषित कर देता है?


आज हालात यह है कि अपने आप को एक दूसरे से बेहतर दिखाने की होड़ सी मची हुई है और इस भागम भाग में अपनी नैतिकता को भी कहीं ना कहीं खोते जा रहे हैं।

आज हमारे किसी भी पत्रकार साथी पर कोई अधिकारी हो या कर्मचारी आरोप प्रत्यारोप लगाने की जुगत में हमेशा तैयार रहता है कि इस पत्रकार को कैसे फंसाया जाय?


लेकिन सबसे ज्वलंत मुद्दा यह है कि अगर किसी भी पत्रकार पर झूठा आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज हो जाती है तो हमारे ही पत्रकार साथी उसे फर्जी और तथाकथित लिखने से परहेज नहीं करते हैं क्या यह सही है?


जबकि किसी भी मामले में अगर कोई भी आरोप किसी पर लगता है तो जब तक कि न्यायालय द्वारा यह सिद्ध नहीं होता है कि लगाए गए आरोप सही हैं तब तक किसी को भी अपराधी मान लेना उचित नहीं है।


एक बात यह भी है कि पत्रकारिता को छोड़कर किसी और पेशे में अगर कोई व्यक्ति काम करता है तो उस विभाग के कर्मचारी पर अगर कोई आरोप लगाता है तो सभी कर्मचारी मिलकर उस एक कर्मचारी का सपोर्ट करते हैं और उसको संबल प्रदान करने का कार्य करते हैं जिससे कि वह अपना जवाब मजबूती से रख पाता है।


सन्तोष कुमार 

प्रांतीय मीडिया प्रभारी 

एमपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन भोपाल 

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