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गेहूं उपार्जन को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का स्पष्ट संदेश

किसानों को मिले सम्मान और समय पर भुगतान

लेखक : सन्तोष कुमार


मध्यप्रदेश एक कृषि प्रधान राज्य है और यहां की अर्थव्यवस्था की धुरी किसान और उनकी मेहनत पर टिकी हुई है। खेतों में लहलहाती गेहूं की फसल केवल उत्पादन का प्रतीक नहीं होती बल्कि उस किसान के सपनों और परिश्रम का परिणाम होती है जो पूरे वर्ष मौसम की चुनौतियों के बीच खेती करता है। ऐसे में गेहूं उपार्जन की प्रक्रिया को सुचारू और पारदर्शी बनाना शासन की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है। इसी जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जिला कलेक्टरों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि उपार्जन व्यवस्था में किसानों को किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए और उन्हें उनकी उपज का भुगतान समय पर सुनिश्चित किया जाए।


मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का यह दृष्टिकोण केवल प्रशासनिक निर्देश नहीं है बल्कि किसानों के प्रति उनकी संवेदनशीलता को भी दर्शाता है। किसान के लिए उपार्जन केन्द्र केवल फसल बेचने का स्थान नहीं होता बल्कि उसके पूरे वर्ष के परिश्रम का मूल्य प्राप्त करने का माध्यम होता है। जब किसान अपनी उपज लेकर उपार्जन केन्द्र पहुंचता है तो उसकी अपेक्षा होती है कि वहां सभी व्यवस्थाएं सुचारू हों, तौल प्रक्रिया पारदर्शी हो और भुगतान में अनावश्यक विलंब न हो। मुख्यमंत्री द्वारा बारदानों की उपलब्धता, किसानों के सत्यापन और उपार्जन केन्द्रों की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश इसी सोच को आगे बढ़ाते हैं।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को यह भी स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रशासन में वही अधिकारी टिकेंगे जो परिणाम देंगे। “परफार्मेंस और परिणाम देने वाले कलेक्टर ही मैदान में रहेंगे” जैसे स्पष्ट शब्द शासन की कार्यसंस्कृति को नई दिशा देने वाले हैं। यह संदेश न केवल जिला कलेक्टरों के लिए है बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए एक जिम्मेदारी का संकेत भी है कि योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।

डॉ. मोहन यादव की कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वे शासन को केवल योजनाओं तक सीमित नहीं रखना चाहते बल्कि व्यवस्था में अनुशासन और जवाबदेही भी सुनिश्चित करना चाहते हैं। कार्यालयीन समय के पालन को लेकर उनकी सख्ती इसी सोच को दर्शाती है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि यदि सरकारी कार्यालयों में समयबद्धता नहीं आएगी तो छह दिवसीय कार्य सप्ताह जैसी व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है। यह संदेश प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक जिम्मेदार और जनहितकारी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

मुख्यमंत्री ने केवल कृषि व्यवस्था ही नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता बताई है। वर्तमान समय में प्रदेश के स्कूलों और महाविद्यालयों में परीक्षाएं चल रही हैं। ऐसे में उन्होंने जिला अधिकारियों को शैक्षणिक संस्थानों, छात्रावासों और विश्वविद्यालय परिसरों का आकस्मिक निरीक्षण करने के निर्देश दिए हैं ताकि परीक्षाओं का संचालन व्यवस्थित और निष्पक्ष रूप से हो सके।

आज के डिजिटल युग में भ्रामक सूचनाओं का तेजी से फैलना भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि शासन और प्रशासन से संबंधित किसी भी प्रकार की भ्रामक जानकारी का जिला स्तर पर तुरंत खंडन किया जाए। यह पहल प्रशासन की पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

प्रदेश में वर्ष 2026 को किसान कल्याण वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा भी मुख्यमंत्री की किसान हितैषी सोच को दर्शाती है। मेलों और आयोजनों में कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में नवाचार करने वाले किसानों को मंच देने की पहल न केवल उनके प्रयासों का सम्मान करेगी बल्कि अन्य किसानों को भी नई दिशा और प्रेरणा देगी।

वास्तव में किसी भी राज्य की प्रगति का सबसे मजबूत आधार उसके किसान होते हैं। जब शासन संवेदनशीलता के साथ किसानों की समस्याओं को समझता है और उन्हें समय पर समाधान देने का प्रयास करता है तब विश्वास और विकास दोनों मजबूत होते हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा दिए गए निर्देश इसी दिशा में एक सकारात्मक और दूरदर्शी पहल के रूप में देखे जा सकते हैं जो प्रदेश के किसानों के हितों को और अधिक सशक्त बनाने की क्षमता रखते हैं।

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