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“सूखती धरती की सिसकियाँ और एक शिक्षक का संकल्प: क्या हम अब भी नहीं जागेंगे?”

लेखक: सन्तोष कुमार

धरती पर जीवन की कल्पना जल के बिना असंभव है फिर भी आज वही जल सबसे बड़े संकट के रूप में हमारे सामने खड़ा है। नदियाँ सिकुड़ रही हैं, कुएँ सूख रहे हैं और भूगर्भ जलस्तर लगातार गिर रहा है। यह केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व से जुड़ा गंभीर सवाल है। विडंबना यह है कि इस भयावह सच्चाई के बावजूद हम अपनी आदतों में बदलाव लाने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे समय में शिक्षक रणविजय निषाद की कहानी उम्मीद की किरण बनकर सामने आती है। गंगा के घटते जलस्तर और एक छोटे गड्ढे में तड़पती मछलियों का दृश्य उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गया। यह केवल एक दृश्य नहीं था बल्कि प्रकृति की पुकार थी जिसने उनके भीतर गहरा संकल्प जगा दिया। उसी क्षण उन्होंने तय किया कि जल संरक्षण उनके जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य होगा। आज रणविजय निषाद गांव-गांव जाकर लोगों को जल के महत्व और इसके संकट की गंभीरता से अवगत कराते हैं। 


वे बच्चों को शपथ दिलाते हैं किसानों को मेड़बंदी और जल संचयन की तकनीक बताते हैं और आमजन को यह एहसास कराते हैं कि पानी की हर बूंद कितनी कीमती है। उनका यह प्रयास केवल अभियान नहीं बल्कि समाज को जगाने और जोड़ने वाली संवेदनशील कोशिश है। उनकी प्रतिबद्धता केवल जागरूकता तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अपने अनुभव और विचारों को “पर्यावरण संचेतना”, “जल संचेतना”, “समग्र जल प्रबंधन” और “समग्र पर्यावरण दर्शन” जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों में ढाला। ये पुस्तकें केवल साहित्य नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए दिशा और प्रेरणा हैं। जब समाज जल के प्रति लापरवाह हो गया है खुला नल, अनियंत्रित धुलाई और बेमतलब बहाया पानी रणविजय निषाद हमें आईना दिखाते हैं और सवाल उठाते हैं कि क्या हम भी बदलाव के लिए तैयार हैं। उनका कार्य सराहनीय है और उन्हें कौशांबी और आसपास के क्षेत्रों में ‘जलपुरुष’ के नाम से जाना जाता है। उन्हें राष्ट्रीय निषाद संघ का प्रदेश सचिव बनाया गया और विभिन्न सामाजिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया। 


यह मान्यता दर्शाती है कि उनका संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि समाज और प्रकृति के लिए प्रेरक है। रणविजय निषाद ने यह साबित कर दिया है कि एक व्यक्ति भी समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है। उनका अभियान बच्चों, किसानों और आमजन में चेतना पैदा कर रहा है और आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता साफ कर रहा है। जल संरक्षण कोई कठिन कार्य नहीं है बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की आदतों से शुरू होता है नल को समय पर बंद करना, वर्षा जल संचयन करना और पानी का सोच-समझकर उपयोग करना। 

जब तक हम जल को केवल संसाधन मानते रहेंगे तब तक उसका संरक्षण संभव नहीं है। हमें इसे जीवन के रूप में स्वीकार करना होगा। यदि आज हम नहीं जागे तो कल यह धरती केवल सिसकियों में बदल जाएगी। 

जल केवल संसाधन नहीं जीवन है और इसे बचाना अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन चुका है।

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