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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में आत्मनिर्भर गांवों की ओर बढ़ता मध्यप्रदेश

*स्वयं के राजस्व संग्रहण में प्रदेश में सर्वश्रेष्ठ बनने की दिशा में अग्रसर* 

*भोपाल जिले की ग्राम पंचायतों में स्वयं के राजस्व संग्रहण का आंकड़ा सर्वश्रेष्ठ* 

लेखक : सन्तोष कुमार 

किसी भी राज्य की असली ताकत उसके गांव होते हैं और जब वही गांव आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने लगें तो समझ लेना चाहिए कि विकास की जड़ें अब गहरी हो रही हैं। मध्यप्रदेश में इन दिनों ऐसा ही एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है जहां मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के नेतृत्व में ग्राम पंचायतें आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं।


भोपाल जिले की ग्राम पंचायतों द्वारा स्वयं के राजस्व संग्रहण में किया गया उल्लेखनीय कार्य इस दिशा में एक मजबूत संकेत है। यह केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं बल्कि उस सोच का परिणाम है जिसे मुख्यमंत्री ने जमीनी स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया है कि गांव केवल योजनाओं के उपभोक्ता न रहें बल्कि अपने विकास के स्वयं निर्माता बनें।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की प्राथमिकताओं में स्थानीय स्वशासन को मजबूत करना और पंचायतों को वित्तीय रूप से सक्षम बनाना प्रमुख रहा है। यही कारण है कि आज पंचायतें अपने संसाधनों की पहचान कर, कर संग्रहण को एक जन अभियान का रूप दे रही हैं। भोपाल जिले में 4.65 करोड़ रुपए का स्वयं का राजस्व संग्रहण इस बात का प्रमाण है कि सही दिशा और नेतृत्व मिलने पर ग्रामीण व्यवस्था कितनी प्रभावी हो सकती है।

इस परिवर्तन के पीछे केवल नीतियां नहीं बल्कि एक स्पष्ट विजन काम कर रहा है एक ऐसा विजन जिसमें गांवों को आत्मनिर्भर बनाकर राज्य के समग्र विकास को गति देना शामिल है। 

पंचायत स्तर पर सरपंच, सचिव, टैक्स सखी और ग्राम रोजगार सहायकों की सक्रिय भागीदारी इस बात को दर्शाती है कि यह पहल केवल ऊपर से थोपे गए आदेश नहीं बल्कि नीचे से उठी सहभागिता का परिणाम है।

सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह राजस्व गांवों के ही विकास में लगाया जा रहा है सड़क, स्वच्छता, जल व्यवस्था और रखरखाव जैसे कार्यों में। इससे न केवल आधारभूत सुविधाएं बेहतर हो रही हैं बल्कि लोगों का विश्वास भी अपनी पंचायत व्यवस्था पर मजबूत हो रहा है। यही वह भरोसा है जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली पूंजी होता है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में यह मॉडल अब अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। यह दर्शाता है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्रतिबद्धता साथ आएं तो बदलाव केवल कागजों तक सीमित नहीं रहता बल्कि गांव की धरती पर भी दिखाई देता है।

आज जरूरत है कि इस पहल को और व्यापक बनाया जाए ताकि प्रदेश का हर गांव इस आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ सके। 

भोपाल की ग्राम पंचायतों ने जो शुरुआत की है वह मध्यप्रदेश के भविष्य की दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है एक ऐसा भविष्य जहां विकास की कहानी गांवों से लिखी जाएगी और नेतृत्व की पहचान जनविश्वास से होगी।

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