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कलेक्टर व्यवस्था का पतन: एक चेतावनी, एक सवाल

*लेखक : सन्तोष कुमार* 

कभी कलेक्टर का नाम सुनते ही जिले में एक भरोसा जाग उठता था। यह भरोसा सिर्फ सत्ता का नहीं बल्कि न्याय, संवेदना और त्वरित निर्णय का होता था। आम आदमी जानता था कि अगर उसकी बात कलेक्टर तक पहुँच गई तो वह अनसुनी नहीं रहेगी। लेकिन आज वही कलेक्टर व्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं।

आज कलेक्टर से संवाद करने पर जो शब्द सुनाई देते हैं— “देखते हैं”, “दिखवाते हैं”, “मेरे हाथ में कुछ नहीं है”—वे केवल औपचारिक जवाब नहीं हैं बल्कि एक टूटती हुई व्यवस्था की स्वीकारोक्ति हैं। जब जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी ही अपने अधिकारों को लेकर असहाय महसूस करे तो यह सिर्फ व्यक्तिगत कमजोरी नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे का पतन है।


कलेक्टर कभी जिले में शासन का चेहरा हुआ करता था। वही अधिकारी आपदा में मोर्चा संभालता था वही कानून और मानवता के बीच संतुलन बनाता था। उसका एक आदेश व्यवस्था को गति देता था। आज वही कलेक्टर फाइलों की परतों, अनुमति की प्रतीक्षा और ऊपर से आने वाले संकेतों में उलझा हुआ दिखाई देता है। अधिकार धीरे-धीरे ऊपर खिसकते गए और नीचे रह गई केवल जिम्मेदारी।

इस पतन का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि इसका असर सीधा आम आदमी के मन पर पड़ रहा है। जब वह आख़िरी उम्मीद लेकर कलेक्टर के पास जाता है और वहाँ से भी निराश लौटता है तो उसका विश्वास सिर्फ एक पद से नहीं बल्कि शासन व्यवस्था से उठ जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र भीतर से कमजोर होने लगता है।

यह कहना भी आसान है कि कलेक्टर निष्क्रिय हो गए हैं लेकिन सच्चाई यह है कि व्यवस्था ने उन्हें निष्क्रिय बना दिया है। निर्णय लेने का साहस अब जोखिम बन गया है। हर फ़ैसले के साथ ट्रांसफर, जांच और आरोपों का डर जुड़ा है। ऐसे माहौल में संवेदनशील और ईमानदार अधिकारी भी खामोशी को अपना सुरक्षा कवच बना लेते हैं।

यह स्थिति सरकार और समाज दोनों के लिए चेतावनी है। जिला प्रशासन जितना कमजोर होगा, शासन उतना ही दूर और अप्रासंगिक महसूस होगा। कलेक्टर व्यवस्था को कमजोर करना दरअसल जनता और शासन के बीच की उस आख़िरी कड़ी को कमजोर करना है जो भरोसे पर टिकी होती है।

अब सवाल यह है कि क्या हम इस पतन को चुपचाप स्वीकार कर लेंगे? या फिर कलेक्टर को फिर से वह अधिकार, सम्मान और विश्वास लौटाया जाएगा जो इस पद की आत्मा रहा है? अगर समय रहते इस पर गंभीर मंथन नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियाँ कलेक्टर व्यवस्था को एक इतिहास के अध्याय की तरह पढ़ेंगी जहाँ लिखा होगा कि एक समय था जब जिले में निर्णय होते थे… और फिर वह व्यवस्था धीरे-धीरे खामोश हो गई।

*इनसेट बॉक्स* 

कलेक्टर की कुर्सी कभी सिर्फ अधिकार की नहीं बल्कि भरोसे की पहचान थी। उसी कुर्सी के सामने खड़ा आम आदमी अपनी आख़िरी उम्मीद रख देता था यह विश्वास लेकर कि अब उसकी पीड़ा सुनी जाएगी। लेकिन जब उसी कुर्सी से यह आवाज़ आए कि “मेरे हाथ में कुछ नहीं है” तो टूटता केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे सिस्टम पर टिका विश्वास बिखर जाता है। यह क्षण प्रशासन की असफलता से कहीं आगे जाकर लोकतंत्र की आत्मा को आहत करता है क्योंकि जब आख़िरी दरवाज़ा भी बंद हो जाए तो आदमी के पास चुप्पी के सिवा कुछ नहीं बचता।*

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