लेखक : सन्तोष कुमार
न्याय व्यवस्था का असली उद्देश्य केवल निर्णय सुनाना नहीं बल्कि समाज में संतुलन, विश्वास और सामंजस्य स्थापित करना भी है। जब विवादों का समाधान वर्षों तक अदालतों की दहलीज पर भटकने के बजाय आपसी सहमति और संवाद से हो जाता है तब न्याय की वास्तविक भावना प्रकट होती है। भोपाल में आयोजित वर्ष 2026 की पहली नेशनल लोक अदालत ने इसी मानवीय और संवेदनशील न्याय व्यवस्था की मिसाल प्रस्तुत की है।
14 मार्च 2026 को जिला न्यायालय भोपाल में आयोजित इस लोक अदालत में समझौते और राजीनामे के आधार पर बड़ी संख्या में मामलों का समाधान किया गया। आँकड़े बताते हैं कि इस एक दिन के आयोजन में कुल 27,249 प्रकरणों का निराकरण किया गया जिनमें 3,786 लंबित न्यायालयीन प्रकरण और 23,463 प्री-लिटिगेशन प्रकरण शामिल हैं। इन मामलों में पारित अवार्ड की कुल राशि 57 करोड़ 16 लाख 88 हजार 328 रुपये से अधिक रही। यह केवल आंकड़ों की उपलब्धि नहीं है बल्कि उन हजारों लोगों के जीवन में आई राहत की कहानी है जो लंबे समय से किसी न किसी विवाद में उलझे हुए थे।
लोक अदालत में विभिन्न प्रकार के मामलों का समाधान किया गया। इनमें 526 चेक बाउंस के मामले, 458 मोटर दुर्घटना दावा प्रकरण, 623 आपराधिक राजीनामा योग्य प्रकरण, 113 पारिवारिक मामले, 224 बैंक रिकवरी प्रकरण, 85 व्यवहार वाद, 191 विद्युत अधिनियम से संबंधित मामले, 11 श्रम विभाग के प्रकरण तथा 4256 जलकर और संपत्ति कर से जुड़े मामले शामिल रहे। इन मामलों का एक ही दिन में समाधान यह दर्शाता है कि यदि संवाद और सहमति की भावना मजबूत हो तो जटिल से जटिल विवाद भी सहजता से समाप्त हो सकते हैं।
दरअसल परंपरागत न्याय प्रक्रिया में कई बार छोटे-छोटे विवाद भी वर्षों तक लंबित रहते हैं। इससे न केवल न्यायालयों पर बोझ बढ़ता है बल्कि आम नागरिकों को भी आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में लोक अदालतें न्याय का एक मानवीय विकल्प बनकर सामने आती हैं जहां समाधान किसी पर थोपा नहीं जाता बल्कि दोनों पक्षों की सहमति से निकाला जाता है। यही कारण है कि यहां होने वाला निर्णय स्थायी और संतोषजनक होता है।
भोपाल की इस लोक अदालत के लिए 60 खंडपीठों का गठन किया गया था और कुल 92,316 प्रकरणों को निराकरण के लिए चिन्हित किया गया था। इनमें से हजारों मामलों का निपटारा होना इस बात का प्रमाण है कि न्यायपालिका, प्रशासन, अधिवक्ताओं और समाज के संयुक्त प्रयास से न्याय को अधिक सुलभ और प्रभावी बनाया जा सकता है।
लोक अदालतें हमें यह संदेश देती हैं कि न्याय केवल कानून की कठोर धाराओं में ही नहीं बल्कि संवाद, संवेदनशीलता और सहमति की भावना में भी निहित है। यदि समाज में सुलह और समझौते की संस्कृति मजबूत होती है तो न केवल अदालतों का बोझ कम होगा बल्कि रिश्तों में आई दूरियां भी कम होंगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि अधिक से अधिक लोग लोक अदालतों की इस व्यवस्था को समझें और छोटे-बड़े विवादों के समाधान के लिए इसका उपयोग करें। क्योंकि जब न्याय तेजी से और सहजता से मिलता है तब ही लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास और मजबूत होता है।
लोक अदालतें वास्तव में न्याय के उस मानवीय चेहरे की पहचान हैं जहां कानून के साथ-साथ संवेदनाएं भी निर्णय का हिस्सा बनती हैं।



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