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एक बगिया मां के नाम: महिलाओं की जमीन से उपजी समृद्धि की कहानी

 *लेखक : सन्तोष कुमार* 

जब किसी सरकारी योजना का नाम मां से जुड़ता है तो वह केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं रह जाती बल्कि भावनाओं, संस्कारों और भविष्य की जिम्मेदारी से जुड़ जाती है। मध्यप्रदेश सरकार की ‘एक बगिया मां के नाम’ परियोजना ऐसी ही एक दूरदर्शी सोच का परिणाम है जो महिलाओं की मेहनत, प्रकृति की शक्ति और तकनीक की समझ को एक साथ जोड़ती है।

प्रदेश में स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इन्हीं प्रयासों की कड़ी में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा महात्मा गांधी नरेगा के अंतर्गत शुरू की गई यह परियोजना केवल रोजगार सृजन तक सीमित नहीं है बल्कि स्थायी आय, सम्मान और आत्मविश्वास की दिशा में एक ठोस कदम है। इस योजना के तहत महिलाओं की निजी भूमि पर फलोद्यान की बगिया विकसित की जा रही है जो आने वाले वर्षों में उनके जीवन की आर्थिक रीढ़ बनेगी।


इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता इसका डिजिटल और पारदर्शी स्वरूप है। हितग्राहियों का चयन केवल ‘एक बगिया मां के नाम’ ऐप के माध्यम से किया जा रहा है जिसका निर्माण मनरेगा परिषद द्वारा MPSEDC के जरिए कराया गया है। किसी अन्य माध्यम से चयन की अनुमति न होना इस बात का प्रमाण है कि सरकार योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। भूमि महिला के नाम न होने की स्थिति में पति, पिता, ससुर या पुत्र की भूमि पर सहमति से पौधरोपण की व्यवस्था कर अधिक से अधिक महिलाओं को योजना से जोड़ने का रास्ता भी खोला गया है।

यह परियोजना इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि प्रदेश में पहली बार अत्याधुनिक तकनीक से पौधरोपण किया जा रहा है। सिपरी सॉफ्टवेयर के माध्यम से जमीन का चयन, मिट्टी परीक्षण, जलवायु के अनुसार फलदार पौधों का निर्धारण, सिंचाई के जलस्रोतों की उपलब्धता और पौधरोपण का उपयुक्त समय हर पहलू वैज्ञानिक पद्धति से तय किया जा रहा है जो भूमि उपयुक्त नहीं पाई जाती वहां पौधे नहीं लगाए जाते। यह सोच दर्शाती है कि लक्ष्य केवल रोपण नहीं बल्कि सफल और टिकाऊ बगिया विकसित करना है।

योजना के तहत प्रत्येक ब्लॉक में न्यूनतम 100 हितग्राहियों का चयन किया जा रहा है। चयनित महिलाओं के लिए 0.5 से 1 एकड़ भूमि की सीमा तय की गई है और उन्हें वर्ष में दो बार प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे महिलाएं केवल लाभार्थी नहीं रहेंगी बल्कि वैज्ञानिक खेती समझने वाली कुशल उद्यान प्रबंधक बनेंगी।

इस पूरी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ‘कृषि सखी’ की तैनाती की जा रही है। हर 25 एकड़ पर एक कृषि सखी महिलाओं को खाद प्रबंधन, सिंचाई, कीट नियंत्रण, जैविक खाद और अंतरवर्तीय फसलों की जानकारी देगी। यह सहयोग महिलाओं के लिए मार्गदर्शक की तरह काम करेगा।

पौधरोपण की निगरानी ड्रोन और सैटेलाइट इमेज के जरिए की जा रही है। साथ ही एक विशेष डैशबोर्ड तैयार किया गया है जिससे योजना की प्रगति पर लगातार नजर रखी जा सके। बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिलों, जनपदों और ग्राम पंचायतों को पुरस्कृत करने की व्यवस्था स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और जिम्मेदारी का भाव पैदा करती है।

‘एक बगिया मां के नाम’ सिर्फ एक योजना नहीं बल्कि एक सोच है जहां मां के सम्मान से जुड़ा नाम महिलाओं की मेहनत और प्रकृति की हरियाली मिलकर समृद्धि की कहानी लिख रहे हैं। यह बगिया केवल फल नहीं देगी बल्कि आने वाली पीढ़ियों को आत्मनिर्भरता, सम्मान और उम्मीद की छांव भी प्रदान करेगी।

*इनसेट बॉक्स* 

यह केवल फलदार पौधों की बगिया नहीं है यह मां के नाम बोया गया वह सपना है जिसमें महिलाओं की मेहनत जड़ बनती है और आत्मनिर्भरता फल बनकर जीवन को संवारती है। जब एक महिला अपनी जमीन पर हरियाली उगाती है तो वह सिर्फ खेत नहीं सींचती वह अपने परिवार का भविष्य, अपनी पहचान और आने वाली पीढ़ियों की उम्मीदों को भी सींचती है। ‘एक बगिया मां के नाम’ वास्तव में सम्मान, स्वाभिमान और समृद्धि की एक जीवंत कहानी है।*

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